अमरीकी टैक्सी ड्राइवर (अमरीकी डायरी – ८)

देश का हालचाल जानने के लिए रेल यात्रा सबसे उपयुक्त माध्यम है। परिस्थितियां ऐसी रहीं कि बचपन से ही मुझे खूब यात्राएं करनी पड़ीं। नई जगहों, नई बातों, नई चीज़ों के बारे में जानना मुझे हमेशा से पसंद था। इसलिए इन यात्राओं से बहुत-कुछ सीखने को मिला। मन में जिज्ञासा भी खूब थी, आज भी है। इसलिए सीखना-समझना-जानना आज भी जारी है। लेकिन अब भारत में रेलयात्रा करने का मौका बहुत कम मिलता है। ज़्यादातर मुझे विमान से ही यात्रा करनी पड़ती है। हालांकि कोशिश करके साल में एकाध बार भारत में रेलयात्रा करने का मौका मैं निकालता हूं, लेकिन वो अब बस पुराने दिनों को याद करने का बहाना भर है।

अब रेलयात्राएँ भले ही कम हो गई हैं, लेकिन कभी-कभार कहीं आने-जाने के लिए टैक्सी से यात्रा करनी ही पड़ती है, तो अब टैक्सी ड्राइवरों से बातचीत होती है। पहले मुझे ये आदत नहीं थी। मैं आमतौर पर चुप ही रहता था। लेकिन अमरीका में एक बात देखी कि सामान्यतः यहां के टैक्सी चालक बातें बहुत करते हैं। पहली-पहली बार आया तब मुझे ये बहुत नापसंद था। मुझे गुस्सा भी आता था कि ये चुपचाप गाड़ी क्यों नहीं चलाते। लेकिन मजबूरन बात करनी ही पड़ती थी और उन्हीं अनुभवों से यह समझ आया कि वास्तव में उनसे बातें करने से बहुत-कुछ जानने समझने को मिलता है। अब तो मैं जानबूझकर टैक्सियों में ड्राइवर के साथ वाली सीट पर ही बैठता हूं और खुद ही उनसे बात करता हूं।

लेकिन टैक्सी ड्राइवरों से बात करने का महत्व वास्तव में मैंने २०१४ में ही जाना था। तब मैं पुणे में रहता था और नासिक जाने के लिए एक दिन मैंने टैक्सी ली थी। वे लोकसभा चुनाव से पहले वाले दिन थे। उस ड्राइवर से दिन भर जो बातें हुईं, उनसे उस इलाके की चुनावी हवा को समझने में मदद मिली।

फिर अप्रैल २०१६ में मैं एक दिन के लिए सिंगापुर से दिल्ली आया था, तब इलाहाबाद के एक टैक्सी ड्राइवर से मुलाक़ात हुई और दिल्ली व उप्र के राजनैतिक माहौल और लोगों के मूड के बारे में जानने को मिला। तब मैंने विस्तार से एक पोस्ट भी लिखी थी।

२०१६ से ही मेरा अमरीका आना-जाना भी शुरू हुआ। अमरीका आप्रवासियों का देश है। भारत के महानगरों में मुझे अन्य राज्यों से आए टैक्सी ड्राइवर मिलते थे, अमरीका में मुझे दूसरे देशों से आए हुए टैक्सी ड्राइवर मिलते हैं। कभी-कभार अमरीकी टैक्सी ड्राइवर भी मिल जाते हैं। चीन, फिलीपींस, अफगानिस्तान, भारत, मेक्सिको आदि कई देशों से आए टैक्सी ड्राइवरों से यहां मुलाकात हुई है। उनसे उनके देशों के जीवन की जानकारी मिलती है, वहां की परिस्थितियों, वहां की राजनीति, वहां की समस्याओं के बारे में पता चलता है।

अफगानी ड्राइवर से हुई बातचीत के बारे में तो मैंने कुछ दिनों पहले एक पोस्ट भी लिखी थी। शायद आपने पढ़ी होगी।

पिछले हफ्ते यहीं फ्रीमोंट में एक युवक से मुलाकात हुई। वह कुछ सालों पहले हरियाणा से छत्तीसगढ़ के भिलाई शहर में रहने लगा था। वहां से वह पढ़ाई करने अमरीका आया और फिर कुछ महीनों बाद पढ़ाई छोड़कर उसने यह काम शुरू कर दिया। भिलाई मेरा जन्मस्थान है। सॉफ्टवेयर कंपनियों में तो हज़ारों भारतीय काम करते हैं, इसलिए वहां भारतीयों से मुलाकात होना कोई अचरज की बात नहीं है, लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा था कि भिलाई का कोई व्यक्ति मुझे अमरीका में टैक्सी चलाता हुआ भी मिल जाएगा!

एक बार मेक्सिको के एक टैक्सी चालक से मुलाकात हुई थी। मेक्सिको ड्रग्स के तस्करों और गैंगवॉर के लिए कुख्यात है। उस व्यक्ति से बात करते-करते मेक्सिको के बारे में कई बातें जानने को मिलीं, तस्करों और सरकार के बीच क्या आपसी तालमेल है, अगर मैं कभी मेक्सिको घूमने जाऊं, तो मुझे किन बातों का ध्यान रखना चाहिए आदि कुछ ऐसी चीज़ें हैं जो मुझे किसी किताब या वेबसाइट से उतनी अच्छी तरह जानने को नहीं मिलेंगी, जितनी उस व्यक्ति से बातें करके जानने को मिलीं। इतना ही नहीं, उसे भारत के बारे में भी थोड़ा-बहुत मालूम था। इस बात से मुझे अचंभा हुआ। लेकिन फिर पता चला कि यहीं उसका एक पुराना दोस्त है, जो कई सालों पहले भारत से अमरीका आकर बस गया है और यहां कई होटलों का मालिक है। उस दोस्त से इस ड्राइवर ने भारत के बारे में बहुत-कुछ सुना था और मुझसे भी वह भारत के बारे में और जानने का इच्छुक था।

भारत के बारे में कोई बात करता है तो स्वाभाविक रूप से मुझे बहुत खुशी होती है। एक बार जुलाई में पालो आल्टो के आइकिया स्टोर से घर आने के लिए मैंने टैक्सी ली और उस दिन जो महिला टैक्सी ड्राइवर थी, वह बॉलीवुड के गाने बजा रही थी। पूछने पर पता चला कि किसी मित्र से उसे हिन्दी गीतों के बारे में पता चला और उसे इतने पसंद आए कि वह अक्सर इस इलाके के स्थानीय हिन्दी रेडियो चैनल पर बॉलीवुड के गीत सुना करती है। उसने अच्छे गीतों वाली कुछ फिल्मों के नाम मुझसे भी मांगे थे। बात हिन्दी फिल्मों के गीतों से शुरू हुई और भारत से होती हुई अमरीका की ज़िंदगी और फिर गरीबी तक पहुंची। उसने बताया कि हफ्ते में एक दिन की पूरी कमाई वह एक सामाजिक संस्था को देती है, जिससे गरीब बच्चों की पढ़ाई में मदद मिले। उसके पास एक साइकिल थी, जिसका उपयोग वह अब नहीं करती थी, इसलिए उसने वह एक गरीब युवती को दे दी, ताकि उस लड़की को घर से अपने कार्यस्थल पर जाने में मदद मिले और लड़की से उसने यह कहा कि जब वह इतने पैसे जमा कर ले कि नई साइकिल खरीद सके, तो ये वाली किसी और ज़रूरतमंद को दे दे, ताकि एक और व्यक्ति की मदद हो सके। मुझे ये बातें बहुत अच्छी लगीं। एक तरफ तो ऐसे लोग हैं, जो सीमित संसाधनों के बावजूद दूसरों की भी मदद करने की नीयत रखते हैं, जबकि दूसरी तरफ ऐसे लोगों की भी कमी नहीं, जिनके पास सब-कुछ है, लेकिन लालच खत्म नहीं होता है, जिनकी जेब से दूसरों की मदद के लिए एक पैसा भी नहीं निकलता है, जो लोगों को प्रयास करने की प्रेरणा देने की बजाय सिर्फ समाज और सरकारों के खिलाफ भड़काने में लगे रहते हैं और उनका जीवन खराब करके अपना स्वार्थ पूरा करते हैं। मुझे दुःख होता है कि भारत में अब पहली श्रेणी के लोग कम और दूसरी श्रेणी वाले ही ज़्यादा हो गए हैं।

अभी कल-परसों एक युवती और मिली थी। वह दिन में कॉलेज में पढ़ाई करती है और शाम को कुछ घंटे टैक्सी चलाती है, ताकि कुछ पैसे जमा कर सके। उसने बताया कि वह इस हफ्ते ज्यादा काम कर रही है क्योंकि वह थोड़े ज़्यादा पैसे जोड़कर अगले महीने की छुट्टी में अपनी माँ को कहीं अच्छी जगह घूमने-फिरने ले जाना चाहती है!

पिछले हफ्ते ही एक फिलिपीनो टैक्सी ड्राइवर भी मिला था। वह २० सालों से यहां रहता है, लेकिन अभी भी हर साल कुछ दिनों के लिए अपने देश फिलिपींस अवश्य जाता है। वह पेशे से सिविल इंजीनियर था और अब नौकरी से निवृत्त होने के बाद कभी-कभार टैक्सी चलाता है। उससे मैंने फिलीपींस के राष्ट्रपति रॉड्रिगो दुतेर्ते के कामकाज और उनके बारे में लोगों की राय के बारे में पूछा। पिछले साल जब दुतेर्ते चुनाव जीतकर राष्ट्रपति बने थे, तब मैं सिंगापुर में ही रहता था और अक्सर मीडिया में दुतेर्ते के बारे में चर्चा सुनने को मिलती थी। बहुत-से विवाद भी सुनने को मिलते थे। संयोग से यह टैक्सी चालक फिलीपींस के उसी इलाके का था, जहां के एक शहर में दुतेर्ते कई वर्षों तक मेयर रहे थे। इसलिए इस व्यक्ति से ऐसा बहुत-कुछ सुनने को मिला, जो मीडिया, अखबारों या इंटरनेट से जानने को नहीं मिलेगा।

लेकिन ऐसा नहीं है कि हर बार नई और सही जानकारियां ही मिलती हैं। कभी-कभी ऐसे लोग भी मिलते हैं, जिनकी जानकारी या धारणाएं गलत भी होती हैं। कुछ लोगों को बढ़ा-चढ़ाकर स्वयं को ज्ञानी बताने की आदत भी होती है। पिछले महीने एक टैक्सी चालक से मुलाकात हुई। स्वाभाविक है कि उसे नहीं मालूम था कि मैं किस कंपनी में काम करता हूं या किन देशों में जा चुका हूं। वैसे भी मैं अपने बारे में न के बराबर ही बात करता हूं। उसने मुझे मेरी ही कंपनी के बारे में कई बातें इस तरह बढ़ा-चढ़ाकर बताईं, जैसे मैं नहीं बल्कि वही इस कंपनी में काम करता हो। इतना ही नहीं उसने सिंगापुर के बारे में भी बहुत-कुछ बताया, जो कि पूरी तरह गलत था। मैंने घुमा-फिराकर बातों-बातों में उसे संकेत दिया कि उसकी जानकारी गलत भी हो सकती है, लेकिन उसने दावा किया कि वह कई बार सिंगापुर जा चुका है और वहां की गली-गली से वाकिफ़ है। ऐसे लोगों को मैं टाल देना ही उचित समझता हूं, इसलिए मैंने भी उससे कह दिया कि उसकी बातें सुनकर मेरी जिज्ञासा बहुत बढ़ गई है और अब मैं सिंगापुर ज़रूर जाना चाहता हूं।

ये तो सिर्फ कुछ उदाहरण हैं, लेकिन ऐसे अनुभवों की गिनती शायद कभी खत्म नहीं होगी। विभिन्न लोगों के संघर्षों, विचारों, अनुभवों और बातों से वास्तव में बहुत कुछ जानने समझने को मिलता है। कई बार कोई जानकारी मिलती है, कभी पुरानी धारणाएं बदलती हैं, कभी नई प्रेरणा भी मिलती है। लेकिन सबसे ज्यादा मुझे हर बार यह अहसास भी होता है कि ऊपरी तौर पर लोगों में चाहे कितनी ही विभिन्नताएं क्यों न हों, लेकिन विभिन्नता की उन परतों के नीचे वास्तव में हम सबमें बहुत सारी समानताएं हैं। वास्तव में अनुभवों से बड़ा कोई शिक्षक नहीं है और मेरे ख्याल से दूसरों के ऐसे अनुभवों के बारे में जानने से मेरा मन और मेरे अनुभव भी समृद्ध बनते हैं। वाकई दुनिया ही ज़िंदगी की सबसे बड़ी पाठशाला है!

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