पुस्तकें

जीवन में कब, क्या हो जाए, ये कोई नहीं बता सकता। ये बात कम से कम मैंने तो अपने जीवन में सैकड़ों बार महसूस की है। उसका एक पुराना उदाहरण पिछले हफ्ते याद आया, आज समय मिला है, तो सोचा आपको भी बताऊँ।

मैं बड़ा होकर क्या बनना चाहता हूँ, मेरी ये इच्छा उम्र के साथ-साथ बदलती रही। लेकिन ७-८ साल की उम्र में एक पड़ाव ऐसा भी आया, जब मैं नौसेना में जाना चाहता था। घर-परिवार से भी इसके लिए प्रोत्साहन मिला और फिर मैं नासिक में एक सैनिक स्कूल में पढ़ाई के लिए पहुँच गया। तब मेरी उम्र १० साल थी। हालांकि वहां ज़िन्दगी कितनी कठिन थी, ये तो वहीं जाकर पता चला, लेकिन अब तो ओखली में सर दे ही दिया था, तो आगे ६ सालों तक मेरी स्कूली शिक्षा उसी सैनिक स्कूल से पूरी हुई।

वहाँ पढ़ाई के अलावा बहुत सारी चीज़ें सीखने को मिलीं। लेकिन उनकी चर्चा बाद में कभी करूँगा। आज सिर्फ उनमें से एक चीज़ की बात करनी है।

हमारे उस स्कूल में बाकी बातों के अलावा एक बड़ी लाइब्रेरी भी थी। मैंने अपने जीवन में पहली बार कंप्यूटर शायद इसी स्कूल में देखा था, लेकिन मुझे उससे भी ज्यादा जो बात याद है और पसन्द है और जिसके लिए मैं आज भी कृतज्ञ हूँ, वो ये है कि मैंने जीवन में इतनी बड़ी लाइब्रेरी पहली बार इसी स्कूल में देखी थी। उससे पहले भी शायद मुझे कॉमिक्स और बच्चों की कहानियों वाली किताबें पढ़ने का थोड़ा-बहुत शौक रहा होगा, लेकिन मुझे उस बात का अहसास कभी हुआ नहीं था।

उस लाइब्रेरी में कदम रखना मेरी ज़िंदगी के कुछ ‘टर्निंग पॉइंट्स’ में से एक है। वहाँ मैंने पहली बार अलग-अलग विषयों की, अलग-अलग भाषाओं की, अलग-अलग प्रकार की सैकड़ों किताबें देखीं। कई भाषाओं के कई सारे अखबार और पत्रिकाएं देखीं। मैंने जीवन में इतना सारा साहित्य एक साथ कभी देखा ही नहीं था। उसी दिन से पुस्तकों में मेरी कुछ ऐसी रुचि जागी, जो फिर कभी कम नहीं हुई।

उसके बाद से मैं लगातार लाइब्रेरी में जाने लगा। क्लास के पहले, स्कूल के बाद, ब्रेक में, ऑफ पीरियड में, जब मौका मिलता था, मैं लाइब्रेरी में पहुंच जाता था। कई बार क्लास बंक करके भी वहां चला जाता था और बाद में डांट भी खाता था।

उस लाइब्रेरी से हमें १५ दिन में केवल दो पुस्तकें पढ़ने को मिलती थीं, लेकिन दो पुस्तकें तो मैं दो दिन में ही निपटा लेता था। फिर बाकी दिनों में क्या किया जाए? तो क्लास के कुछ ऐसे सहपाठी, जिनका किताबों से कोई नाता नहीं था, मैं उनसे पुस्तकें मंगवाकर पढ़ता था। बाद में जब हम सीनियर हो गए, तो अपने जूनियर्स से भी किताबें ही मंगवाने लगा। पढ़ने की लत कुछ ऐसी लगी कि मैंने उन दिनों इतिहास, भूगोल, राजनीति, जीवनी, कहानी, उपन्यास जो मिला सब पढ़ डाला। स्कूल की लाइब्रेरी कम लगने लगी, तो मैं रविवार की छुट्टी में भी शहर में किताबों की दुकानों और पुस्तक मेलों में पहुँच जाता था, फिर फुटपाथ पर लगने वाली दुकानें भी छान लेता था और खूब किताबें पढ़ता था। उसके भी आगे रेल यात्राओं में या किसी दूसरे शहर में जाने पर भी मैं सिर्फ किताबें ही खरीदता था।

इस तरह पढ़ने की आदत लगी, तो फिर अपने विचार लिखना भी धीरे-धीरे सीख गया। भाषाओं से तो मुझे बचपन से ही प्रेम था, लेकिन बाद में ऐसा भी विचार आया कि भाषाओं के क्षेत्र में या पढ़ने-लिखने से जुड़ा हुआ ही कुछ काम भी करूँ। तब ये नहीं पता था कि क्या किया जा सकता है और कैसे किया जा सकता है, लेकिन धीरे-धीरे सीखता हुआ मैं बाद में लेखन और अनुवाद के क्षेत्र में जा पहुँचा और आज भी उसी में हूँ। कभी डायरी के पन्नों पर लिखने से शुरुआत हुई थी, जो कि फिर ब्लॉग लिखने, पुस्तकें लिखने, उनका अनुवाद करने से लेकर अब सोशल मीडिया पर लिखने तक लगातार जारी है। अगर मैं उस दिन उस स्कूल की लाइब्रेरी में न पहुँचा होता, तो आज मैं यहाँ तक भी न पहुँचा होता।

बाद में कंप्यूटर, लैपटॉप, फ़ोन और टैबलेट का ज़माना आया, तो पुस्तकें भी ई-बुक बन गईं और पीडीएफ में और अमेज़न किंडल वाले फॉर्मेट में मिलने लगीं। मेरे जीवन में भी ऐसे कुछ बदलाव हुए कि बार-बार यात्राएं करनी पड़ती थीं, इसलिए हर जगह पुस्तकें ढोना मुश्किल था। इस कारण ईबुक का उपयोग बेहतर लगा क्योंकि एक फोन या टैब में सैकड़ों पुस्तकें साथ रख सकता हूँ और कभी भी पढ़ सकता हूँ।

पिछले साल मैं अमरीका में रहने आया। यहाँ के बारे में कई बातें सुनी थीं, जिनमें से एक ये थी कि यहाँ हर शहर में एक पब्लिक लाइब्रेरी होती है, जहाँ से मुफ़्त में कोई भी पुस्तकें लेकर पढ़ी जा सकती हैं। यहाँ आया, तो सोचा था कि किसी दिन लाइब्रेरी जाऊँगा, लेकिन किसी न किसी कारण बात टलती रही। लाइब्रेरी में रजिस्ट्रेशन ऑनलाइन हो गया था और उनके ऐप से कई पुस्तकें भी पढ़ने को मिल जाती थीं, इस कारण भी कभी अलग से लाइब्रेरी जाने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई।

लेकिन पिछले रविवार को फुर्सत मिली, तो सोचा कि कम से कम लाइब्रेरी की एक झलक तो देखी जाए। इसलिए मैं यहां हमारे शहर की मुख्य लाइब्रेरी में गया।

कई सालों पहले अपने उस स्कूल की लाइब्रेरी में जाने पर मुझे जो महसूस हुआ था, लगभग वही मुझे उस दिन यहाँ की लाइब्रेरी में फिर महसूस हुआ। मैं गया तो यही सोचकर था कि बस ५-१० मिनट में एक चक्कर लगाकर मैं निकल आऊंगा, लेकिन जब वहां फिर एक बार सैकड़ों पुस्तकें शेल्फ में रखी देखीं, तो मेरे कदम वहीं जम गए। मैं १० मिनट में निकलने के इरादे से गया था, लेकिन मैं ढाई घण्टों तक वहां किताबें पलटता रहा। यहाँ तक कि इस लाइब्रेरी में मुझे हिन्दी, गुजराती, पंजाबी, बांग्ला और ऊर्दू पुस्तकें भी मिलीं! ऐसी कई किताबें दिखीं, जो मैं पढ़ने के लिए ले जाना चाहता था। लेकिन अब मेरे पास पहले जैसी वो फुर्सत नहीं है कि मैं सारे काम छोड़कर सिर्फ किताबें पढ़ सकूं। इसलिए बड़ी मुश्किल से उनमें से सिर्फ एक किताब लेकर आया हूँ और इन दिनों रोज़ समय निकालकर उसी को पढ़ रहा हूँ। उम्मीद है कि जल्दी ही उसे खत्म कर लूँगा और फिर एक-एक करके अपनी पसंद की बाकी किताबें भी लाकर पढूँगा। और तो और उस दिन लाइब्रेरी से निकलते-निकलते वहाँ के एक कर्मचारी से बात करते समय मुझे यह भी पता चला कि हमारे इस इलाके में ऐसे नौ पुस्तकालय और हैं, जहाँ से मैं इस तरह किताबें लाकर पढ़ सकता हूँ! तो अब जल्दी ही मैं एक-एक करके उन सबमें भी हाजिरी लगाने जाऊँगा।

यहां की लाइब्रेरी में केवल पुस्तकें नहीं हैं। कई अन्य गतिविधियां भी आयोजित होती रहती हैं। बच्चों के लिए कभी कोई प्रतियोगिता, कभी उन्हें कथा-कहानी सुनाने के लिए कोई कार्यक्रम, कभी कुछ और। इसके अलावा उनके लिए क्लास भी होती है शायद। बुजुर्गों के लिए कुछ और आयोजन, दूसरे देशों से आए हुए लोगों को अंग्रेज़ी सिखाने की कक्षाएं, यहां की नागरिकता लेने की प्रक्रिया को समझने की कक्षाएं, यूनिवर्सिटी के छात्रों के लिए कई संदर्भ ग्रंथ या यहां बैठकर अध्ययन करने के लिए अलग व्यवस्था आदि कई सुविधाएं हैं। यहां तक कि लैपटॉप और टैबलेट किराए पर लेने की भी व्यवस्था है, ताकि जिनके पास ये साधन नहीं हैं, वे भी इनके उपयोग से वंचित न रहें। मुझे वहां हर उम्र के, हर सामाजिक स्तर के और हर नस्ल, भाषा, देश के लोग दिखाई दिए। सचमुच अमरीका की लाइब्रेरी बहुत सारी उपयोगी गतिविधियों का केंद्र है।

वाकई जीवन में कब, क्या हो जाए, ये कोई नहीं बता सकता। लेकिन मैं ये सोच रहा हूँ कि क्या कभी हम भारत में भी ऐसा कर सकेंगे कि हर शहर में एक अच्छा पुस्तकालय हो, जहाँ बच्चा-बूढ़ा, गरीब-अमीर, गृहिणी और बेरोजगार कोई भी जाकर मुफ़्त में अच्छी पुस्तकें पढ़ सके, और इस तरह के अन्य साधनों का सुगमता से उपयोग कर सके? लेकिन उससे भी पहले, क्या हम अपने लोगों की मानसिकता में ये बदलाव ला पाएंगे कि पुस्तकों को फाड़ें नहीं, केवल पढ़ें; चुराए नहीं, केवल ले जाएं और समय पर लौटाएं; लाइब्रेरी में शोर न करें, बल्कि अध्ययन करें! क्या ये बदलाव हम अपने समाज में कभी ला सकेंगे? अमरीका कितना सुंदर है, कितना महान है, कितना विकसित है, और वहां जीवन कितना स्वतंत्र है, इस बारे में बैठे-बैठे चर्चा करने वाले कई लोग मैंने भारत में कई जगह देखे हैं। लेकिन अमरीका में लाइब्रेरी भी होती है और लोग वहां जाकर वाकई पुस्तकें पढ़ते भी हैं, इस बारे में बात करने वाला मुझे आजतक शायद भारत में कोई भी नहीं मिला है। क्यों नहीं मिला है, ये एक गहरा सवाल है, जिसका जवाब इस पोस्ट को पढ़ने वाला हर व्यक्ति अवश्य जानता है। सादर!

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