तेल के खेल में डूबता वेनेजुएला

वेनेजुएला

कुछ दिनों पहले मैंने मालदीव और उसके बाद दक्षिण अफ्रीका की घटनाओं के बारे में दो लेख लिखे थे। मालदीव का संकट अभी सुलझा नहीं है, लेकिन दक्षिण अफ्रीका में राष्ट्रपति जैकब जुमा को उनकी पार्टी ने पद से हटाकर उपराष्ट्रपति सैम्युअल रैम्फोसा को नया राष्ट्रपति चुन लिया है, इसलिए वहां का मामला फिलहाल ठंडा पड़ चुका है। लेकिन दूर दक्षिण अमरीका के एक देश वेनेजुएला में भी पिछले कई महीनों से भीषण उथल-पुथल जारी है। आज के लेख में मैं उसी बारे में लिख रहा हूं।

ह्यूगो शावेज

५ मार्च २०१३ को ५८ वर्ष की आयु में वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज की कैंसर से मौत हो गई। उन्हीं की पार्टी के नेता निकोलस मादुरो अगले राष्ट्रपति बने। शावेज ने अपने १४ वर्षों के शासन के दौरान गरीबों को मकान, स्वास्थ्य, भोजन आदि उपलब्ध करवाने के लिए कई सरकारी योजनाओं की शुरुआत की थी। इन योजनाओं के लिए धन तेल के निर्यात से होने वाली कमाई से मिलता था क्योंकि वेनेजुएला विश्व के प्रमुख तेल उत्पादक देशों में से एक है। राष्ट्रपति बनने के बाद मादुरो ने भी घोषणा की कि वे अपने गुरु और आदर्श नेता शावेज की नीतियों को ही जारी रखेंगे।

निकोलस मादुरो

लेकिन २०१४ आते-आते बहुत-कुछ बदलने लगा था। वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था लगभग पूरी तरह केवल तेल के भण्डार पर ही निर्भर है। अब तेल की कीमतों में लगातार गिरावट शुरू हो चुकी थी। स्वाभाविक था कि इससे देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह लड़खड़ा गई। वेनेजुएला की मुद्रा बोलिवर की कीमत में भी लगातार गिरावट हुई। महंगाई सैकड़ों गुना बढ़ गई। दूध, ब्रेड और अंडे जैसी मूलभूत वस्तुओं की कीमत हज़ारों बोलिवर पर जा पहुंची। अपनी दैनिक आवश्यकताओं को पूरा कर पाना भी लोगों के लिए असंभव-सा हो गया। दूसरी तरफ सरकार ने भी कई योजनाओं के लिए दी जाने वाली सब्सिडी हटा दी या वे योजनाएं ही बंद कर दीं।

अर्थव्यवस्था ठप्प हो जाने से बेरोज़गारी बढ़ी, जिसके बाद अपराधों में भी वृद्धि होती गई। देशभर में सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। कुछ राजनैतिक घटनाओं ने भी स्थिति और बिगाड़ दी। फरवरी में मादुरो सरकार ने विपक्षी नेता लियोपोल्ड लोपेज़ को गिरफ़्तार कर लिया। उन पर सरकार विरोधी प्रदर्शनों को भड़काने और हत्या का आरोप लगा। उन्हें १३ साल की सज़ा सुनाई गई। एक वर्ष बाद फरवरी २०१५ में देश की राजधानी कराकास के मेयर को भी सरकार के खिलाफ साज़िश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया।

दिसंबर २०१५ में एक बड़ी घटना हुई। संसद के चुनाव में वेनेजुएला की विपक्षी पार्टी को दो-तिहाई बहुमत मिल गया। इसका अर्थ ये था कि अब विपक्ष राष्ट्रपति के आदेशों पर संसद में अड़ंगा लगा सकता था। लेकिन अगले ही महीने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद तीन सांसदों को पद छोड़ना पड़ा और विपक्ष बहुमत से दूर हो गया।

दूसरी तरफ पिछले एक वर्ष से अमरीका ने वेनेजुएला पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे। तेल की कीमतें अभी भी लगातार गिरती जा रही थीं। स्थिति लगातार बिगड़ रही थी। इसी बीच राष्ट्रपति मादुरो ने देश में आर्थिक आपातकाल की घोषणा कर दी।

विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति पर तानाशाही का आरोप लगाकर उनके खिलाफ जनमत संग्रह करवाने की मांग की, लेकिन चुनाव आयोग ने इस पर रोक लगा दी। विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग के बारे में चर्चा के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया। इसमें भी हिंसा हुई और सरकार के समर्थकों ने संसद में घुसकर विपक्षी नेताओं के साथ मारपीट की। लगातार जारी हिंसा और सरकार विरोधी प्रदर्शनों को कुचलने के लिए राष्ट्रपति ने सेना को सड़कों पर उतरने का आदेश दिया। सेना की कार्रवाइयों में कई नागरिक मारे गए। इससे सरकार के खिलाफ गुस्सा और बढ़ा।

मई २०१७ में राष्ट्रपति मादुरो ने घोषणा की कि एक संविधान सभा का गठन करके देश के लिए नया संविधान लिखा जाएगा। विपक्षियों ने आरोप लगाया कि मादुरो सारी शक्ति अपने हाथों में केंद्रित करना चाहते हैं। जुलाई में विपक्षी दलों ने एक अनौपचारिक मतदान करवाकर जनता से इसके बारे में राय मांगी और दावा किया कि ९८% लोग इस संविधान सभा को बनाने और नया संविधान तैयार करने के राष्ट्रपति के फैसले के खिलाफ हैं। इसके बावजूद ३० जुलाई को मतदान हुआ और सभी ५४५ सीटें राष्ट्रपति के समर्थकों ने जीती। इसमें भी धोखाधड़ी के आरोप लगे हैं, लेकिन आगे कुछ नहीं हुआ क्योंकि पूरा नियंत्रण राष्ट्रपति के हाथों में ही है। पिछले राष्ट्रपति चुनाव में जो विपक्षी उम्मीदवार वर्तमान राष्ट्रपति के खिलाफ खड़ा हुआ था, अब उस पर अभी अगले १५ वर्षों के लिए प्रतिबंध लगा दिया गया है। विपक्षी दलों को भी २०१८ में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से प्रतिबंधित कर दिया गया है। पिछले कुछ महीनों में हुए स्थानीय निकाय के चुनाव में भी लगभग ९०% सीटों पर मादुरो की पार्टी की ही जीत हुई है।

विरोध प्रदर्शन

कई राजनैतिक और आर्थिक झमेलों के कारण वेनेजुएला पूरी दुनिया में अलग-थलग पड़ता जा रहा है। अमरीका ने आरोप लगाया है कि देश पूरी तरह मादुरो के कब्जे में है, जो अब तानाशाह बन चुके हैं। इसलिए वेनेजुएला की सेना को ही अब राष्ट्रपति के विरुद्ध विद्रोह कर देना चाहिए और देश में लोकतंत्र की पुनर्स्थापना में मदद करनी चाहिए। अमरीकी महाद्वीप के सभी देशों के संगठन ऑर्गनाइजेशन ऑफ अमेरिकन स्टेट्स ने वेनेजुएला की सदस्यता निलंबित कर दी है। ब्राज़ील और कोलंबिया जैसे पड़ोसी देश परेशान हैं कि लाखों की संख्या में वेनेजुएला के लोग इन देशों में शरणार्थी बनकर घुस रहे हैं। इससे इन देशों की अर्थव्यवस्था पर भी प्रभाव पड़ रहा है।

हर तरफ से संकट से घिरे वेनेजुएला को फिलहाल तो मुक्ति का कोई मार्ग नहीं मिल रहा है। तेल के भण्डार ही वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था का एकमात्र आसरा है, लेकिन उसके भी एक बड़े हिस्से पर अब रूस और चीन का कब्जा है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में गिरती अर्थव्यवस्था को संभालने में मदद पाने के लिए वेनेजुएला ने इन देशों से कर्ज या भविष्य में तेल की आपूर्ति के सौदे के बदले एडवांस लिया था। रूस और चीन ही वेनेजुएला को हथियार बेचने वाले दो सबसे बड़े देश भी थे। इन सब कर्जों और हथियारों का बिल अब अरबों डॉलर हो चुका है और इसे न चुका पाने के कारण तेल के कुछ कुएं अब इन देशों ने अपने कब्जे में ले लिए हैं। दोनों ही देशों ने अब वेनेजुएला को आगे और कर्ज देने से भी मना कर दिया है। वेनेजुएला को ईरान अपनो दोस्ती पर भी भरोसा था, लेकिन वहां से भी उसे अब निराशा ही मिल रही है। वास्तव में इन तीनों देशों के लिए वेनेजुएला दोस्त नहीं, बल्कि अमरीका के विरोध का एक मोहरा भर था, जो अब इनके लिए अनुपयोगी हो चुका है।

वेनेजुएला में अब आगे क्या होगा, यह तो शायद कुछ समय बीतने के बाद ही पता चलेगा, लेकिन अब तक के घटनाक्रम को देखकर इतना तो अवश्य कहा जा सकता है कि वेनेजुएला वामपंथ की विफलता का एक और बड़ा उदाहरण है!

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