विजय-दिवस

सन १९४७ में भारत 🇮🇳 का विभाजन हुआ और पाकिस्तान 🇵🇰 जन्मा। तब पाकिस्तान के दो हिस्से थे – एक पश्चिमी पाकिस्तान, जो आज का पाकिस्तान है और दूसरा पूर्वी पाकिस्तान, जो आज का बांग्लादेश है।

इस नए राष्ट्र के जन्म के समय पश्चिमी हिस्से की तुलना में पूर्वी पाकिस्तान की जनसंख्या ज्यादा थी। देश की आमदनी में योगदान भी पूर्वी पाकिस्तान का ही ज्यादा था। लेकिन पूर्वी पाकिस्तान के निवासी महसूस करते थे कि उनके योगदान के बदले उन्हें उचित अधिकार और सम्मान नहीं मिल रहा है। बांग्ला भाषा को ऊर्दू जितना महत्व नहीं मिलता था, पूर्वी भाग के नेताओं की बात नहीं सुनी जाती थी, हर मामले में पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओं की मनमानी चलती थी।

पाकिस्तान की आधी से अधिक जनसंख्या बांग्लाभाषी थी, लेकिन मुस्लिम लीग की सरकार ने बांग्ला भाषा को मान्यता नहीं दी। शासकीय दस्तावेज़ों, देश की मुद्रा, प्रतियोगी परीक्षाओं और राजकाज में बांग्ला भाषा को कहीं कोई स्थान नहीं था। नौकरशाही, सरकारी विभागों, सेना आदि में भी बंगालियों को पर्याप्त स्थान नहीं दिया गया। हर जगह मुस्लिम लीग के लोगों का कब्जा था। इस भेदभाव के विरुद्ध १९४८ में ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने आंदोलन छेड़ दिया। इसे कुचलने के लिए सेना और पुलिस ने भारी बर्बरता दिखाई। जिन्ना ने ढाका में पहुंचकर घोषणा कर दी कि पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा केवल ऊर्दू ही रहेगी। इसने आग में घी का काम किया। बांग्लाभाषियों ने विद्रोह कर दिया। १९४९ में मुस्लिम लीग के बांग्ला नेताओं ने अलग होकर ऑल पाकिस्तान अवामी मुस्लिम लीग नामक एक अलग पार्टी बना ली।

१९५२ में बांग्ला भाषा को लेकर फिर आंदोलन छिड़ा। पुलिस ने गोलीबारी की, जिसमें हज़ारों लोग मारे गए। यह पाकिस्तान और वर्तमान बांग्लादेश के इतिहास की निर्णायक घटना साबित हुई। १९५३ में अवामी मुस्लिम लीग ने अपने नाम से मुस्लिम शब्द हटाने का निर्णय लिया, ताकि हिन्दू वोटरों और हिन्दू नेताओं को भी लुभाया जा सके। अब यह अवामी लीग बन गई।

पाकिस्तान का गठन भले ही १९४७ में हो गया था, लेकिन लगभग १ दशक तक यह ब्रिटिश डोमिनियन ही बना रहा। १९५६ में पाकिस्तान का संविधान लागू हुआ। उसके अनुसार १९५९ में पहला आम चुनाव होना प्रस्तावित था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। राजनैतिक अस्थिरता का कारण बताकर राष्ट्रपति ने संविधान को निरस्त कर दिया और देश में मार्शल लॉ की घोषणा करके सत्ता सेना को सौंप दी। जनरल मोहम्मद अय्यूब खां ने खुद को राष्ट्रपति घोषित कर दिया। अय्यूब खां ने नया संविधान बनवाया, जो कि १९६२ में लागू हुआ। इसके अनुसार पाकिस्तान में संसदीय प्रणाली की बजाय राष्ट्रपति प्रणाली को मान्यता मिली और फरवरी १९६५ में पहला राष्ट्रपति चुनाव हुआ, जिसमें अय्यूब खां की ही जीत हुई।

इसके बाद से ही अय्यूब खां के खिलाफ राजनैतिक असंतोष बढ़ना शुरू हुआ। १९६६ में अवामी लीग के नेता शेख मुजीबुर्रहमान ने पूर्वी पाकिस्तान को स्वायत्तता देने की मांग करते हुए आंदोलन छेड़ दिया। उनकी छः मांगें थीं, इसलिए यह आंदोलन सिक्स पॉइंट मूवमेंट कहलाया।

सन १९६७ में अय्यूब खां के विदेश मंत्री और पश्चिमी पाकिस्तान के एक नेता ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने अपने पद से इस्तीफा देकर एक नई राजनैतिक पार्टी बना ली, जिसका नाम था – पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी)।

१९६८ में अय्यूब खां ने शेख मुजीबुर्रहमान पर भारत के साथ मिलकर पाकिस्तान के खिलाफ षड्यंत्र रचने का आरोप लगा दिया, जिसका मतलब था देशद्रोह। यह खबर फैलते ही पूर्वी पाकिस्तान में विद्रोह और भड़क गया।

राजनैतिक दबाव के आगे हार मानकर अय्यूब खां ने १९६९ में पाकिस्तानी सेना के जनरल आग़ा मुहम्मद याह्या खान को सत्ता सौंप दी। राष्ट्रपति बनते ही याह्या खान ने फिर से संविधान को निरस्त कर दिया और देश में फिर मार्शल लॉ की घोषणा कर दी। १९७० में नए कानूनी ढांचे के अनुसार प्रत्यक्ष चुनाव करवाने की घोषणा हुई। वास्तव में यही पाकिस्तान का पहला चुनाव था।

पश्चिमी पाकिस्तान में ४ प्रान्त थे – पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस। लेकिन इन चारों की कुल जनसंख्या से भी अधिक जनसंख्या अकेले पूर्वी पाकिस्तान की थी। नेशनल असेंबली अर्थात संसद में भी पूर्वी हिस्से की सीटों की संख्या भी ज्यादा थी।

संसद की कुल ३०० सीटों के लिए मतदान हुआ। बहुमत के लिए १५० सीटों की आवश्यकता थी। शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व वाली अवामी लीग को १६० सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत मिला। भुट्टो की पीपीपी को केवल ८१ सीटें मिल सकीं।

लेकिन याह्या खान और ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को ये मंज़ूर नहीं था कि कोई बांग्ला नेता सरकार बना ले और देश पर राज करे। मुजीबुर्रहमान को सरकार बनाने का मौका ही नहीं दिया गया।

इसके कारण पूर्वी पाकिस्तान में भीषण असंतोष भड़क गया, जिसने जल्दी ही गृहयुद्ध का रूप ले लिया। इसे कुचलने के लिए पश्चिमी पाकिस्तान की सेना ने ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ नामक सैन्य अभियान चलाया और बांग्ला राष्ट्रवाद के समर्थक नेताओं, छात्रों, बुद्धिजीवियों और नागरिकों को क्रूरतापूर्वक मौत के घाट उतारना शुरू कर दिया। इसके विरोध में बांग्ला समर्थकों ने भी मुक्ति वाहिनी नामक सेना बना ली और युद्ध शुरू हो गया। निर्वासित मुजीबुर्रहमान की अवामी लीग ने अप्रैल १९७१ में पाकिस्तान से अलग होकर कोलकाता में अपने नए राष्ट्र की घोषणा कर दी। बांग्लाभाषियों का यह नया राष्ट्र बांग्लादेश कहलाया। 🇧🇩

पाकिस्तान और नवगठित बांग्लादेश में युद्ध मार्च १९७१ से ही जारी था। लाखों बांग्लादेशी इससे पीड़ित और प्रभावित हुए। भारत ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बांग्ला मुक्ति वाहिनी को राजनैतिक, कूटनीतिक, सैन्य और हर तरह की अन्य सहायता प्रदान की। इससे बौखलाए पाकिस्तान ने दिसंबर १९७१ में भारत के उत्तरी इलाकों पर हमला बोल दिया।

अब भारतीय सेना को प्रत्यक्ष युद्ध में भी उतरना पड़ा। पूर्वी और पश्चिमी दोनों मोर्चों पर युद्ध था। भारतीय सेना की शक्ति के आगे पाकिस्तान टिक नहीं सका। केवल १३ दिनों में ही उनके पांव उखड़ गए और पाकिस्तानी सेना ने हार की शर्म से सिर झुकाकर भारत के आगे हथियार डाल दिये। वह १६ दिसंबर १९७१ का दिन था। वही विजय दिवस कहलाया।

पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए। विश्व ने इस नए राष्ट्र बांग्लादेश को औपचारिक मान्यता दे दी। बांग्लाभाषियों को अपना अलग देश मिल गया। पाकिस्तान के लिए यह केवल सैन्य पराजय ही नहीं, बल्कि कूटनीतिक, राजनैतिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक हार भी थी। उसकी आधी से अधिक जनसंख्या इस नए राष्ट्र में चली गई थी। अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा भी हाथ से निकल गया था। जिन्ना के द्वि-राष्ट्रवाद की भी यह पराजय थी। लेकिन पाकिस्तान के लिए सबसे ज्यादा अपमान की बात यह थी कि उसे भारत से हार स्वीकार करनी पड़ी। उसके ९० हजार सैनिक भारत के युद्धबंदी बने।

लेकिन भारतीय सेना के इस अतुल्य पराक्रम और ऐतिहासिक विजय के बावजूद भारत को क्या हासिल हुआ? यह विचारणीय प्रश्न है। उसका उत्तर जानने के लिए १९७२ के शिमला समझौते के बारे में विस्तार से जानना आवश्यक है। उसकी चर्चा मैंने इस लेख के अगले भाग में की है (उसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

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(चित्र गूगल से)

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