ईस्ट इण्डिया कंपनी की स्थापना (विन -१)

स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि ‘धर्म भारत की आत्मा है’।

यह बात तब जितनी सही थी, आज भी उतनी ही सही है। भारत के इतिहास में धर्म के नाम पर या धर्म की रक्षा के लिए जितने युद्ध हुए हैं, उतने शायद किसी और बात के लिए नहीं हुए होंगे। १० मई १८५७ को मेरठ की छावनी में जो हुआ, उसका भी एक कारण धार्मिक ही था। लेकिन उस पर चर्चा करने से पहले मैं आपको थोड़ा और पीछे ले जाना चाहता हूँ।

१९ मई १५८८ को स्पेन के लड़ाकू जहाज़ों का विशाल बेड़ा लिस्बन से निकला। इस बेड़े में १३० जहाज़, २५०० तोपें, ८००० नाविक और लगभग २०००० सैनिक थे। इतिहास में स्पेनिश अरमाडा के नाम से प्रसिद्ध यह विशाल बेड़ा लगभग ७ मील के दायरे में फैला हुआ था और इसका इरादा इंग्लैंड पर कब्जा करने का था। लेकिन उनका दुर्भाग्य ही था कि मौसम ख़राब हो गया और समुद्री तूफानों ने उनका रास्ता रोक दिया। इंग्लैंड के दक्षिणी तट के पास तक पहुँचने में ही उन्हें २ माह का समय लग गया। तब तक ब्रिटिश सेना को युद्ध की तैयारी के लिए पर्याप्त समय मिल चुका था।

२१ जुलाई को ब्रिटिश नौसेना ने स्पेनियों पर गोलाबारी शुरू कर दी। एक हफ़्ते में ही स्पेन के हौसले पस्त होने लगे थे। वे लोग अभी तक इंग्लिश चैनल को भी नहीं जीत सके थे। उनके जहाज़ों ने फ़्रांस के तट पर कैले बंदरगाह में लंगर डाल रखे थे।

२९ जुलाई की आधी रात के बाद अचानक ८ जलते हुए ब्रिटिश जहाज कैले के तट पर आ पहुँचे। इससे स्पेनियों के बेड़े में भगदड़ मच गई और अपने जहाजों को इस आग से बचाने के लिए उन्हें बंदरगाह छोड़कर समुद्र की ओर भागना पड़ा। कई घण्टों तक चली भीषण लड़ाई के बाद अंततः इंग्लैंड की निर्णायक जीत हुई। पस्त स्पेनी सैनिकों को उत्तर में स्कॉटलैंड की ओर पलायन करना पड़ा। स्कॉटलैंड और आयरलैंड का पूरा चक्कर लगाकर ये लुटे-पिटे लोग जब तक वापस स्पेन पहुँचे, उससे पहले ही उनकी रसद लगभग पूरी तरह खत्म हो चुकी थी। उनके कई जहाज़ युद्ध में बर्बाद हो गए, कुछ समुद्री तूफानों और मौसम की भेंट चढ़ गए। उनका आधे से ज्यादा बेड़ा तबाह हो चुका था और लगभग १५,००० सैनिकों की भी जान चली गई।

इस युद्ध में जीत के साथ ही इंग्लैंड को स्पेनियों के कई जहाज़ और उन पर लदा माल भी हासिल हो गया। युद्ध के बाद लन्दन के कुछ व्यापारियों ने ब्रिटेन की रानी एलिज़ाबेथ प्रथम के दरबार में याचिका देकर अनुरोध किया कि उन्हें हिन्द महासागर की समुद्री यात्रा पर जाने की अनुमति दी जाए। उनका इरादा सुदूर पूर्व (वर्तमान मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया आदि) के इलाके में स्पेनी और पुर्तगाली व्यापारियों के एकाधिकार को ध्वस्त करने का था।

१० अप्रैल १५९१ को उन्हें अनुमति मिल गई और ब्रिटेन की शाही नौसेना के ३ जहाज़ों का बेड़ा इंग्लिश में टॉरबे से निकलकर अफ़्रीका का चक्कर लगाता हुआ कन्याकुमारी को पार करके मलय प्रायद्वीप तक जा पहुँचा। अब ब्रिटिशों ने इस इलाके में स्पेनी-पुर्तगाली जहाजों में लूटपाट करना शुरू कर दिया और १५९४ में वे वापस इंग्लैंड लौटे।

१५८८ की लड़ाई में भले ही स्पेनी-पुर्तगाली सेनाओं की पराजय हुई हो, लेकिन ब्रिटेन के साथ इनका युद्ध अभी भी जारी था। इसी दौरान सन १५९२ में पुर्तगाली तट के पास अटलांटिक महासागर में स्थित फ्लोरेस नामक द्वीप के पास हुई एक लड़ाई में फिर एक बार ब्रिटिशों को जीत मिली। इस लड़ाई में ‘माद्रे-डी-डियोस’ नामक एक पुर्तगाली जहाज़ भी ब्रिटेन के कब्जे में आ गया। वास्तव में यही इस युद्ध की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

लिस्बन के संग्रहालय में माद्रे-डी-डियोस की लघुकृति

माद्रे-डी-डियोस एक विशाल जहाज़ था। इसका निर्माण सन १५८९ में लिस्बन में हुआ था। १६०० टन की क्षमता वाला यह जहाज़ लगभग ९०० टन माल लादकर ले जा सकता था। इसमें ७ डेक थे, ३२ तोपें व कई अन्य हथियार रखे जा सकते थे और लगभग ७०० नाविक इसमें यात्रा करते थे। ब्रिटेन की किसी भी जहाज़ की तुलना में यह कई गुना बड़ा था।

जब ब्रिटेन ने इस जहाज़ पर कब्ज़ा किया, तब इसमें भारी मात्रा में आभूषण, मोती, सोने-चाँदी के सिक्के, कीमती कपड़े के कई थान, ४२५ टन काली मिर्च, 4५ टन लौंग, ३५ टन दालचीनी, १५ टन लकड़ी आदि बहुत-सा कीमती माल लदा हुआ था। इस जीत के साथ ही यह पूरा माल भी ब्रिटेन को मिल गया। लेकिन उससे भी कीमती एक और चीज़ उन्हें इस जहाज़ पर मिली। वह थी इस जहाज़ के कप्तान की आधिकारिक डायरी, जिसमें चीन, भारत और जापान के साथ होने वाले पुर्तगाली व्यापार की पूरी जानकारी लिखी हुई थी। इस लड़ाई से ब्रिटेन को बहुत आर्थिक और व्यापारिक लाभ हुआ। अगले कुछ वर्षों तक सुदूर-पूर्व के इन इलाकों में लूट के उद्देश्य से ब्रिटिश व्यापारियों का आना-जाना लगा रहा। उनके कुछ अभियान सफल हुए, तो कुछ विफल भी रहे।

सन १५९९-१६०० के दौरान कुछ ब्रिटिश व्यापारियों और अधिकारियों का एक समूह फिर एक बार लंदन में जमा हुआ और इन सबने मिलकर पूर्वी एशिया में एक बड़े अभियान की योजना बनाई। इस बार उनका इरादा अगले कुछ वर्षों तक पूरे पूर्वी एशिया के व्यापार पर एकाधिकार के लिए ब्रिटेन की रानी से अनुमति पाने का था। अंततः ३१ दिसंबर १६०० को उनके प्रयास सफल हुए और उन्हें रानी की ओर से आधिकारिक अनुमति-पत्र मिल गया। इस रॉयल चार्टर के अनुसार ‘गवर्नर एंड कंपनी ऑफ़ मर्चेंट्स ऑफ़ लंदन ट्रेडिंग विथ ईस्ट इंडीज़’ नामक इस कंपनी को अगले १५ वर्षों के लिए केप ऑफ़ गुड होप के पूर्व से लेकर मैजेलन जलडमरूमध्य के पश्चिम तक के बीच स्थित सभी देशों के साथ व्यापार का एकाधिकार मिल गया। इसका मतलब यह था कि भारत और चीन सहित पूर्वी एशिया में कहीं भी व्यापार करने के लिए अब केवल यही एक कंपनी अधिकृत कर दी गई थी और अगर इस कंपनी से लाइसेंस लिए बिना कोई अन्य ब्रिटिश कंपनी इन इलाकों में व्यापार करे, तो उसके सभी जहाज़ों और माल को अपने कब्ज़े में लेने का अधिकार इस कंपनी को दे दिया गया। चार्टर की शर्तों में यह भी तय हुआ था कि लूट के ऐसे सारे माल में से आधा हिस्सा इस कंपनी के पास रहेगा और आधा ब्रिटेन की रानी को मिलेगा।

जॉन वॉट्स और जॉर्ज व्हाइट इस कंपनी के दो मुख्य संस्थापक थे। कंपनी के बोर्ड में एक गवर्नर और २४ निदेशकों की नियुक्ति की गई, और कंपनी का पूरे संचालन की ज़िम्मेदारी इन्हीं के हाथों में थी। यही कुख्यात ‘ईस्ट इण्डिया कंपनी’ है!

इसके आगे क्या हुआ और इस कंपनी को भारत में कैसे प्रवेश मिला, उसके बारे में मैं अगले लेख में बात करूँगा।

(सभी चित्र गूगल से)

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