भारत में कंपनी का आगमन (विन – २)

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बांतेन

इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता से लगभग डेढ़ सौ किमी की दूरी पर स्थित बांतेन आज एक छोटा-सा सुस्त शहर है। लेकिन ४०० साल पहले यह एक प्रसिद्ध और व्यस्त बंदरगाह था। अरब, तुर्क, ईरानी, भारतीय, चीनी और अन्य कई देशों के व्यापारी यहां के बाज़ार में अपने देशों से रेशम, चीनी मिट्टी के बर्तन, मसाले, कालीन और अन्य सामान लेकर आते थे। बदले में वे यहाँ से मिर्च और अन्य मसाले खरीदकर ले जाते थे।

दिसंबर १६०० में ईस्ट इंडिया कंपनी को ब्रिटेन की रानी ने एशिया में व्यापार का एकाधिकार दे दिया और फरवरी १६०१ में कंपनी में ४ जहाज जावा और सुमात्रा द्वीपों की यात्रा पर निकले। यह आज का इंडोनेशिया का क्षेत्र है। दिसंबर १६०२ में इनमें से दो जहाज बांतेन के बंदरगाह पर लगे और बाकी दो उत्तर में आचेह में रुक गए।

अंग्रेज़ अपने साथ इंग्लैंड से ऊनी वस्त्र और चांदी लाए थे, जिसके बदले वे इंडोनेशिया से मिर्च और अन्य मसाले वापस यूरोप ले जाकर बेचना चाहते थे। लेकिन जल्दी ही उनकी समझ में आ गया कि उनके ऊनी वस्त्रों की यहाँ कोई कीमत नहीं है। इंडोनेशिया के इस इलाके में साल भर मौसम गर्म रहता है, इसलिए यहाँ लोगों को ऊनी कपड़ों की कोई ज़रूरत नहीं थी। इतनी दूर से हज़ारों मील की कठिन समुद्री यात्रा करके यहाँ तक पहुँचे अंग्रेज़ों के लिए यह एक बड़ा झटका था। इसके अलावा पुर्तगाली और डच ईस्ट इंडिया कंपनियां पहले से ही यहां व्यापार करती रही थीं। इसलिए अंग्रेज़ों के सामने उनसे निपटने की चुनौती भी थी।

अंग्रेज़ लुटेरों ने इन दोनों समस्याओं से निपटने का एक सरल तरीका निकाला। उन्होंने एक बड़े पुर्तगाली जहाज़ को ही लूट लिया! इस लूट में उन्हें भारी मात्रा में सोना, चांदी और भारतीय कपड़ा मिला। भारत का कपड़ा बहुत उच्च-कोटि का होता था और दुनिया के बाज़ार में उसकी बहुत मांग थी। इस लूट के माल को आचेह में बेचकर अंग्रेज़ों ने बदले में मिर्च खरीदी। जल्दी ही उन्हें पता चला कि बांतेन में और भी कम कीमत पर माल खरीदा जा सकता है। अतः उन्होंने वहीं अपना ध्यान केंद्रित किया।

अंग्रेज़ों ने अपनी एशिया में अपनी पहली व्यापारिक चौकी भी वहीं बसाई। अंग्रेज़ ऐसी व्यापारिक चौकियों को ‘फैक्ट्री’ कहते थे और इनका मुख्य अधिकारी ‘फैक्टर’ कहलाता था। इन फैक्ट्रियों में माल के गोदाम होते थे और कंपनी के अधिकारी और कर्मचारी भी यहीं रहा करते थे। ईस्ट इंडिया कंपनी के ये चारों जहाज सन १६०३ में लंदन वापस लौटे। इसके बाद अगले कई वर्षों तक ऐसी यात्राओं का सिलसिला लगातार चलता रहा।

भारत में यूरोपीय देशों की चौकियाँ

अपनी पहली ही यात्रा में अंग्रेज़ों को यह पता चल गया था कि उनके मोटे ऊनी कपड़ों की एशिया में कोई कीमत नहीं है, बल्कि भारतीय कपड़ा बहुत महंगा बिकता है और उसकी मांग सबसे ज्यादा है। इसलिए अब वे भारत के साथ व्यापार की अनुमति चाहते थे। भारत में उस समय मुग़लों का शासन था। इसलिए भारत में व्यापार के लिए यहाँ के मुग़ल शासक से अनुमति लेना आवश्यक था।

सन १६०३ में रानी एलिज़ाबेथ प्रथम की मृत्यु हो गई और जेम्स प्रथम अगला राजा बना। उसने कंपनी का अनुरोध मानकर भारत में व्यापार के प्रयास शुरू करने की अनुमति दे दी। इसके बाद सन १६०७ में विलियम हॉकिन्स नामक एक अंग्रेज़ के नेतृत्व में एक जहाज भारत की यात्रा पर निकला। इस जहाज का नाम “हेक्टर” था। अफ्रीका का चक्कर लगाकर यह जहाज अगस्त १६०८ में सूरत के बंदरगाह पर पहुँचा। हॉकिन्स यहाँ से मुग़लो की राजधानी आगरा जाना चाहता था, ताकि मुग़ल सम्राट से मिलकर यहाँ व्यापार की इजाज़त पा सके।

अब कठिन समुद्री यात्रा तो पूरी हो चुकी थी, लेकिन हॉकिन्स की कठिनाइयां अभी खत्म नहीं हुई थी। यहाँ पहुँचते ही पुर्तगालियों ने उसे गिरफ्तार कर लिया। सन १४९८ में वास्को-डी-गामा जब पहली बार भारत आया, उसके बाद से ही लगातार पुर्तगाली भारत के साथ व्यापार करते आ रहे थे और उनका कहना था कि यहाँ के सभी बंदरगाहों पर व्यापार करने का अधिकार केवल उन्हीं को है!

लेकिन बहुत प्रयासों के बाद अंततः पुर्तगालियों ने विलियम हॉकिन्स को रिहा करने की मंज़ूरी दी और किसी तरह वहाँ से निकलकर वह कई महीनों की यात्रा के बाद अप्रैल १६०९ में आगरा पहुँचा। यहाँ उसने लोगों को बताया कि वह इंग्लैंड के राजा का विशेष दूत है और इस तरह वह आगरा में रहने लगा।

भारत के लिहाज से इंग्लैंड उस समय तक एक गुमनाम देश था। मुग़ल बादशाह तक ख़बर पहुँची कि इस इंग्लैंड देश का कोई दूत आगरा में आया हुआ है। बादशाह ने सन्देश भेजकर हॉकिन्स को दरबार में हाजिर होने का आदेश दिया। वास्तव में हॉकिन्स को इसी बात की प्रतीक्षा थी।

जिस समय इंग्लैंड में रानी एलिज़ाबेथ प्रथम का शासन था, उस समय अकबर भारत का मुग़ल शासक था। अकबर का नाम इंग्लैंड को थोड़ा-बहुत मालूम था। हॉकिन्स इंग्लैंड से आते समय अपने राजा जेम्स की ओर से सम्राट अकबर के नाम एक पत्र और कई उपहार लेकर आया था। अब मुग़ल सम्राट के बुलावे पर वह ये पत्र और उपहार लेकर अकबर से मिलने दरबार में पहुँचा। लेकिन यहाँ पहुँचकर वह चकित रह गया क्योंकि सामने बादशाह अकबर नहीं, बल्कि कोई और ही शासक बैठा हुआ था। अंग्रेज़ों को पता ही नहीं था कि सन १६०५ में ही अकबर की मौत हो चुकी थी और अब मुग़ल शासन की बागडोर उसके पुत्र सलीम के हाथों में थी, जिसने तख़्त हासिल करने के बाद अपना नाम जहाँगीर रखा था।

इसके बाद क्या हुआ? क्या विलियम हॉकिन्स को जहाँगीर ने भारत में व्यापार करने की अनुमति दी? ये मैं आपको अगले लेख में बताऊँगा।

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