जहाँगीर के दरबार में विलियम हॉकिन्स का प्रवेश (विन -३)

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मुग़ल बादशाह के आदेश पर विलियम हॉकिन्स आगरा में बादशाह के दरबार में पहुँचा। यहाँ उसे पता चला कि अकबर की मौत हो चुकी है और अब उसका बेटा जहाँगीर यहाँ का शासक है।

जब से हॉकिन्स भारत पहुँचा, तभी से वह पुर्तगालियों के कहर से परेशान था। पुर्तगाली सन १४९८ से ही भारत के साथ व्यापार कर रहे थे। जब तक हॉकिन्स के रूप में अंग्रेज़ यहाँ पहुँचे, तब तक पुर्तगालियों को भारत आए हुए सौ साल से भी ज़्यादा समय हो चुका था। यहाँ के शासकों में भी उनका अच्छा दबदबा था। दमन-दीव और गोवा जैसे कुछ इलाके तो उन्होंने स्थानीय शासकों से लड़कर छीन ही लिए थे। सूरत के बंदरगाह से आने-जाने वाले सभी जहाजों से भी पुर्तगाली लोग कर वसूलते थे। इतना ही नहीं, अदन की खाड़ी तक के पूरे इलाके में उनका दखल रहता था। एक बार तो उन्होंने औरंगज़ेब का एक जहाज भी पकड़ लिया था।

स्वाभाविक है कि भारत के व्यापार और सरकार में इतना दखल रखने वाले पुर्तगालियों को ये कतई मंज़ूर नहीं था कि अंग्रेज़ों को यहाँ घुसने दिया जाए। इसलिए उन्होंने विलियम हॉकिन्स के गिरोह को परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पहले तो सूरत पहुँचते ही उनके जहाज को पकड़ लिया गया। फिर स्थानीय मुग़ल अधिकारियों की मदद से भी उन्हें बहुत परेशान किया गया। विलियम हॉकिन्स और उसके साथी विलियम फिंच को कस्टम हाउस के एक कमरे में लगभग नज़रबंद करके रखा गया था।

मुग़ल काल में भारत में भ्रष्टाचार भी खूब होता था। सूरत पहुँचते ही अंग्रेज़ों को इसका अच्छी तरह परिचय मिल गया। स्थानीय मुग़ल अधिकारियों ने जाँच के नाम पर उनका सारा माल उतरवा लिया था और उसमें जो उन्हें पसंद आया, वह सब अपने लिए ही रख लिया! अगले कई दिनों तक ऐसा चलता रहा कि मुग़ल अधिकारी कभी भी आते और कुछ भी उठा ले जाते थे।

अंत में परेशान होकर हॉकिन्स ने मुग़ल अधिकारियों को याद दिलाया कि वह इंग्लैंड के राजा का दूत है और मुग़ल बादशाह के लिए सन्देश लेकर आया है। इसके बाद उनके व्यवहार में कुछ बदलाव हुआ और हॉकिन्स को थोड़ा सम्मान मिलने लगा।

लेकिन पुर्तगालियों ने अभी भी कोई नरमी नहीं दिखाई। हॉकिन्स पर २-३ बार जानलेवा हमले हुए, लेकिन वह हर बार बच गया। अब उसे लगने लगा था कि वहाँ रुकना खतरे से खाली नहीं है, इसलिए जल्द से जल्द आगरा पहुँचने की कोशिश की जानी चाहिए। उसके बेड़े में ३ जहाज थे, जिनमें से २ तो पहले ही इंडोनेशिया की तरफ जा चुके थे। तीसरे हेक्टर जहाज का जितना माल सूरत में उतारा गया था, हॉकिन्स का विचार था कि उतना ही माल यहाँ के स्थानीय व्यापारियों से खरीदकर हेक्टर में लदवाया जाए और फिर उसे मुनाफ़े के साथ इंडोनेशिया में बेचा जाए, जहाँ से मसाले खरीदकर इंग्लैंड वापस जाकर बेचे जा सकते थे। मसालों का व्यापार सबसे फायदे का सौदा था क्योंकि पूर्वी एशिया में बहुत सस्ते में मिल जाने वाले मसाले लन्दन और यूरोप में सोने के भाव बिकते थे!

लेकिन पुर्तगालियों ने सूरत के स्थानीय व्यापारियों से माल खरीदने की हॉकिन्स की कोशिशों में भी बाधा डाली। उन्होंने व्यापारियों को धमकाया कि कोई भी अंग्रेज़ों को माल न बेचे। कुछ बड़े स्थानीय गुजराती व्यापारी भी हॉकिन्स के कदम से नाराज़ थे क्योंकि वे खुद गुजरात से कपास और सूती कपड़े ले जाकर इंडोनेशिया के इन द्वीपों में बेचते थे। इसलिए वे भी नहीं चाहते कि एक नया प्रतिद्वंद्वी उनके धंधे में उतरे।

फिर भी हॉकिन्स ने किसी तरह थोड़ा-बहुत माल जुटाया और अपने जहाज में लदवाकर उसे इंडोनेशिया की तरफ रवाना किया। हालांकि बाद में उसे खबर मिली कि वह जहाज पुर्तगालियों ने गोवा में पकड़ लिया था!

सूरत से जहाज रवाना करने के बाद अब हॉकिन्स आगरा जाने की कोशिश में लग गया था। बहुत समय पहले उसने अपने संदेशवाहक आगरा भेजे थे, लेकिन भारत के मानसून की भारी बारिश के कारण वे कई महीनों तक रास्ते में ही फंसे रहे। इसलिए हॉकिन्स को उनका सन्देश पाने के लिए बहुत इंतज़ार करना पड़ा।

अंततः हॉकिन्स ने आगरा जाने का निर्णय किया।उसका साथी विलियम फ्लिंच उन दिनों बीमार हो गया था, इसलिए हॉकिन्स ने अपने बचे-खुचे माल के साथ उसे सूरत में ही रुकने को कहा और कुछ भारतीय अंगरक्षकों के संरक्षण में हॉकिन्स सूरत से बुरहानपुर होता हुआ आगरा की तरफ जाने के लिए निकला। मार्ग में भी उसे सन्देह होता रहा कि पुर्तगाली उसकी जासूसी कर रहे हैं और लगातार उसकी जान के पीछे पड़े हुए हैं।

कई हफ़्तों की कठिन और थकाऊ यात्रा के बाद अप्रैल १६०९ में हॉकिन्स किसी तरह आगरा पहुँच ही गया। उसे लग रहा था कि कम से कम अब तो उसे पुर्तगालियों से मुक्ति मिल जाएगी, लेकिन यहाँ भी उसे निराश ही होना पड़ा। जल्दी ही उसे पता चल गया कि मुग़ल दरबार में भी पुर्तगालियों का अच्छा दबदबा था।

दरबार में पहुँचकर हॉकिन्स ने बादशाह जहाँगीर को सलाम करके इंग्लैंड के राजा का पत्र प्रस्तुत किया। जहाँगीर ने काफ़ी समय तक उस पत्र को देखा, लेकिन पत्र की भाषा उसकी समझ के बाहर थी। इसलिए उसने वह पत्र दरबार में मौजूद एक पुर्तगाली प्रतिनिधि के हाथ में ही थमा दिया!

अब उस पुर्तगाली ने पत्र का अनुवाद जहाँगीर को समझाया, जिसमें लिखा था कि हॉकिन्स इंग्लैंड के राजा की ओर से मित्रता का प्रस्ताव लेकर आया है और अंग्रेज़ सूरत में अपनी व्यापारिक फैक्ट्री खोलने की अनुमति चाहते हैं। लेकिन साथ ही उस पुर्तगाली ने बादशाह के कान भरते हुए यह भी कह दिया कि पत्र में बादशाह का पर्याप्त सम्मान नहीं किया गया है!

स्वभाविक है कि हॉकिन्स इससे बहुत परेशान हुआ। उसे चिंता हुई कि बादशाह अगर नाराज़ हो गया, तो इतने महीनों की सारी मेहनत पर पानी फिर जाएगा। इसलिए तुरंत कुछ करना ज़रूरी था।

सौभाग्य से हॉकिन्स थोड़ी-बहुत तुर्की भाषा जानता था। वास्तव में यह भी एक बड़ा कारण था कि उसे ही इस अभियान के लिए चुना गया। अब उसने तुर्की भाषा के अपने ज्ञान का उपयोग करके बादशाह से कुछ मीठी बातें की और उसे प्रसन्न कर लिया। जहाँगीर उसकी बातों से इतना खुश हुआ कि उसने हॉकिन्स से आगरा में ही रुक जाने का आग्रह किया। साथ ही, उसे ‘खान’ की पदवी दी और उसके लिए लगभग ३००० पाउंड वार्षिक की रकम भी जारी कर दी। जल्दी ही वह बादशाह के ख़ास लोगों में शामिल हो गया। बादशाह उसे ‘अंग्रेज़ खान’ कहा करता था।

इन सब बातों से पुर्तगाली और भी ज़्यादा नाराज़ हुए। दरबार में हॉकिन्स की हैसियत गिराने और उसे रास्ते से हटाने के प्रयास अब उन्होंने और तेज़ कर दिए। परेशान हॉकिन्स ने जहाँगीर से इस बात की शिकायत की। इसके बाद जहाँगीर ने पुर्तगाली प्रतिनिधि को बुलाकर चेतावनी दे दी कि अगर हॉकिन्स को कोई भी चोट पहुँची या संदेहास्पद तरीके से उसकी मौत हो गई, तो इसके लिए पुर्तगालियों को ही ज़िम्मेदार माना जाएगा। साथ ही उसने हॉकिन्स का भोजन बनाने के लिए एक अर्मेनियाई ईसाई महिला को भी नियुक्त किया, ताकि उसके भोजन में जहर मिलाकर मारने की कोई कोशिश न हो। बाद में हॉकिन्स ने इसी महिला से विवाह भी कर लिया और कुछ वर्षों बाद उसे अपने साथ ही इंग्लैंड ले गया।

अब बादशाह से पर्याप्त संरक्षण मिल जाने के बाद हॉकिन्स ने यहाँ का अपना काम पूरा करने की कोशिश शुरू की। उसने बादशाह से अनुरोध किया कि वे एक फ़रमान जारी कर दें, जिससे अंग्रेज़ों को भारत से व्यापार करने की अनुमति मिल जाए। जहाँगीर ने उसका अनुरोध मान लिया और अंग्रेज़ों को भारत में मुक्त व्यापार करने की इजाज़त दे दी।

इससे उत्साहित होकर हॉकिन्स ने तुरन्त सूरत सन्देश भिजवाकर अपने साथी विलियम फिंच को वहाँ से आगरा आने को कह दिया।

लेकिन इसके बावजूद अंग्रेज़ भारत में व्यापार शुरू नहीं कर सके क्योंकि कुछ ही दिनों बाद जहाँगीर ने अपना पिछला फरमान रद्द कर दिया और अंग्रेज़ों को चेतावनी दे दी कि वे दोबारा कभी भी मुग़ल साम्राज्य के किसी बंदरगाह पर व्यापार के लिए दिखाई भी न दें!

आखिर ऐसा क्या हो गया था कि जहाँगीर ने अपना फ़रमान जारी करके भी बाद में रद्द कर दिया और अंग्रेज़ों को दी गई व्यापार की अनुमति वापस ले ली? यह मैं आपको अगले भाग में बताऊँगा। फ़िलहाल आप कमेन्ट लिखकर मुझे बताइये कि आपको लेख कैसा लगा?

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