हॉकिन्स की इंग्लैण्ड वापसी (विन – ४)

पिछले भाग में मैंने आपको बताया था कि हॉकिन्स के कई अनुरोधों और कोशिशों के बाद बादशाह जहाँगीर ने एक फ़रमान जारी करके अंग्रेज़ों को भारत में व्यापार करने की अनुमति दे दी। इससे उत्साहित होकर हॉकिन्स ने तुरन्त सूरत सन्देश भिजवाया और अपने साथी विलियम फिंच को आगरा बुलवा लिया। लेकिन उधर आगरा के मुग़ल दरबार में फिर कुछ ऐसा हुआ, जिसके कारण बादशाह ने अंग्रेज़ों को दिया फ़रमान रद्द कर दिया। आखिर ऐसा क्या हुआ था? इस पर आज बात करेंगे।

पिछले भागों को पढ़कर आप जान ही गए होंगे कि अंग्रेज़ों के आने के बहुत पहले से ही पुर्तगाली भारत से व्यापार कर रहे थे। उन्होंने गोवा से लेकर गुजरात तक कई जगह अपनी व्यापारिक चौकियां बनाई हुई थी। कई बंदरगाहों पर उनका नियंत्रण था। वहां आने वाले सभी जहाजों से वे कर वसूलते थे। शासकों व अधिकारियों से भी उनके घनिष्ठ संबंध थे। मुग़ल दरबार में उनका प्रतिनिधि नियुक्त रहता था।

गोवा में पुर्तगाली वॉयसराय तक यह खबर पहुँची कि जहाँगीर ने अंग्रेज़ों को भारत में व्यापार की अनुमति दे दी है। पुर्तगाली तुरन्त सक्रिय हो गए। बहुत सारे उपहारों के साथ प्रतिनिधि को आगरा रवाना किया गया। उसने दरबार में पहुँचकर बादशाह को पुर्तगालियों से मित्रता की याद दिलाई और यह अनुरोध किया कि अंग्रेज़ों को दी गई व्यापार की अनुमति रद्द कर दी जाए क्योंकि वे पुर्तगालियों के प्रतिस्पर्धी हैं। उनके उपहारों, चापलूसी और कूटनीति का असर ये हुआ कि बादशाह ने अंग्रेज़ों को दिया गया फ़रमान रद्द कर दिया!

अब हॉकिन्स की समझ में आ गया था कि वह पूरी तरह अकेला पड़ चुका है। अब वह किसी तरह वहाँ से निकलकर वापस इंग्लैंड पहुँचना चाहता था। दूसरी तरफ लंदन में, हॉकिन्स की विफलताओं से अनभिज्ञ ईस्ट इंडिया कंपनी ने तीन नए जहाज पूर्व की ओर व्यापार के लिए रवाना कर दिए थे। उनमें से एक को भारत आना था। लेकिन दुर्भाग्य से उनमें से एक जहाज अफ्रीका के तट पर और दूसरा सूरत के पास नष्ट हो गया। इस दूसरे जहाज में मौजूद कर्मचारी किसी तरह जान बचाकर किनारे तक पहुँचे। वहाँ से कुछ समय बाद वे लोग सड़क मार्ग से आगरा आए। तब जाकर उन लोगों को पता चला कि दरबार में पुर्तगालियों का दबदबा है और यहाँ अंग्रेज़ों की दाल नहीं गलने वाली है। वे लोग हॉकिन्स की विफलता के कारण उससे बहुत नाराज़ हुए। इसी बात को लेकर कई बार उनमें आपसी विवाद भी होते रहते थे। फिंच तो पहले ही आगरा आ चुका था। हॉकिन्स और फिंच के बीच भी कई बार कहासुनी हुई।

अब अंग्रेज़ किसी तरह वहाँ से निकलकर वापस इंग्लैंड पहुँचना चाहते थे। लेकिन उनके पास कोई जहाज नहीं था, इसलिए उन्हें यही एक तरीका दिखाई दिया कि किसी तरह वापस सूरत या गोवा चले जाएं और वहाँ से लिस्बन जाने वाले किसी पुर्तगाली जहाज पर किसी तरह सवार होकर यूरोप पहुँच जाएँ। इस विचार के साथ कुछ लोग आगरा से निकलकर गुजरात में सूरत के पास खंभात लौट आए। यह उस समय भारत का एक प्रमुख बंदरगाह था। यहाँ उन्हें खबर मिली कि कुछ ही दिनों पहले एक और ब्रिटिश जहाज सूरत आया हुआ है। उत्साहित होकर वे लोग सूरत जा पहुँचे। यहाँ उनकी मुलाकात सर हेनरी मिडलटन से हुई, जो अपने साथ कुछ जहाजों का काफिला लेकर व्यापारिक यात्रा पर निकला था। यहाँ आकर उसे पता चला कि जहाँगीर ने अंग्रेज़ों की व्यापार की अनुमति रद्द कर दी है। हालांकि कुछ भारतीय व्यापारी अभी भी चोरी-छिपे अपना माल अंग्रेज़ों को बेचने के इच्छुक थे, लेकिन पुर्तगालियों की निगरानी के कारण अंग्रेज़ों के लिए यह व्यापार खतरे का सौदा था। इसलिए उन्होंने वह विचार त्याग दिया। कुछ समय बाद आगरा से बचे-खुचे अंग्रेज़ भी सूरत पहुँच गए और वहाँ से मिडलटन के जहाजों में सवार होकर वे इंग्लैंड के लिए वापस रवाना हो गए। दुर्भाग्य से इस यात्रा के दौरान इंग्लैंड पहुँचने से पहले ही हॉकिन्स की रास्ते में ही मौत हो गई। उसकी पत्नी इंग्लैंड पहुँचने में सफल रही। बाद में उसने कम्पनी से अपने पति की मौत के लिए हर्जाना भी मांगा, लेकिन कंपनी ने हॉकिन्स के कारण हुए नुकसान के नाम पर सारी रकम डकार ली और उपहार के नाम पर थोड़ी-सी रकम हॉकिन्स की पत्नी को थमा दी।

अंग्रेज़ तो वापस इंग्लैंड लौट गए, लेकिन हॉकिन्स का साथी विलियम फिंच उनके साथ नहीं गया था। उसने समुद्री मार्ग की बजाय थलमार्ग से जाने का निर्णय लिया और वह आगरा से लाहौर होता हुआ आगे बढ़ा। दुर्भाग्य से रास्ते में ही उसकी मौत हो गई और वह भी इंग्लैंड नहीं पहुँच सका। लेकिन उसकी डायरी किसी तरह लंदन पहुँच गई, जिसमें उसने अपनी भारत यात्रा का विस्तार से वर्णन लिखा था। उसने सूरत और आगरा के अलावा भी भारत के कई शहरों और कई घटनाओं की पूरी जानकारी लिख रखी थी, जिससे अंग्रेज़ों को भारत के बारे में बहुत-कुछ पता चला। फिंच भारत में कई जगह घूमा था। वह अयोध्या भी गया था और उसने वहाँ राम के मंदिर, रामकोट और वहाँ आने वाले श्रद्धालुओं व ब्राह्मणों के कार्यकलापों का भी विस्तृत वर्णन लिखा है। लेकिन अचरज की बात ये है कि उसके संस्मरणों में बाबरी मस्जिद का कोई ज़िक्र नहीं है!

विलियम हॉकिन्स के समय भारत आए अंग्रेज़ों ने हॉकिन्स की कमियों को ही कंपनी की विफलता के लिए ज़िम्मेदार ठहराया है। उनके वर्णन के अनुसार हॉकिन्स को शराब की बुरी लत थी, जो कई बार बादशाह की नाराज़गी का कारण बनी। इसके अलावा हॉकिन्स ने मुगल दरबार के कई अधिकारियों से भी दुश्मनी मोल ले ली थी। इसमें गुजरात का सूबेदार प्रमुख था, जिसने सूरत में हॉकिन्स के आगमन के समय उसका बहुत-सा माल यूं ही अपने कब्जे में रख लिया था। बाद में किसी और कारण से नाराज़ होकर बादशाह ने उसे गुजरात से आगरा बुलवा लिया, तब उसने बादशाह को प्रसन्न करने के लिए भेंट में कई वस्तुएं दीं, जिनमें से कुछ तो वही थीं जो उसने सूरत में हॉकिन्स से छीनी थी। इस समय दरबार में ही मौजूद हॉकिन्स ने जब वे वस्तुएँ देखीं तो बाद में सूबेदार से उनकी कीमत माँगी। वह थोड़े पैसे देने को राज़ी था, लेकिन हॉकिन्स पूरी कीमत वसूलने पर अड़ा रहा, जिससे बात बिगड़ गई। हॉकिन्स का दुर्भाग्य ही था कि बाद में बादशाह ने उसी सूबेदार को गोवा में नियुक्त कर दिया और उसने पुर्तगालियों के साथ मिलकर अंग्रेज़ों का खेल बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

इतनी विफलताओं और झमेलों के कारण भारत में व्यापार करना फिलहाल तो अंग्रेज़ों के लिए संभव ही नहीं था। लेकिन हॉकिन्स, फिंच और भारत से लौटे अन्य लोगों की डायरियों और अनुभवों से ईस्ट इंडिया कंपनी यह अच्छी तरह समझ चुकी थी कि भारत वाकई बहुत विशाल और समृद्ध देश है, जहाँ व्यापार और लूटपाट करने की असीम संभावनाएं मौजूद हैं। इसलिए इतनी मुसीबतों और संकटों के बावजूद भी कंपनी ने अपना इरादा नहीं बदला और किसी न किसी तरह भारत से सीधे व्यापार करने की अनुमति पाने की अपनी कोशिशें जारी रखीं। अंततः उन्हें जल्दी ही सफलता भी मिल गई।

इसकी कहानी मैं आपको लेख के अगले भागों में बताऊँगा। फिलहाल आप मुझे बताइये कि आपको अब तक की जानकारी कैसी लगी?

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