ज़ी फैक्टर: सही वक्त, पर गलत आदमी

हाल ही में मैंने ज़ी मीडिया ग्रुप और कई अन्य उद्योग समूहों के संस्थापक डॉ. सुभाष चंद्रा की आत्मकथा ‘ज़ी फैक्टर’ पढ़ी। इस पोस्ट के माध्यम से उस पुस्तक की जानकारी आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूं।

बहुत छोटी उम्र से परिवार और व्यापार की ज़िम्मेदारी संभालने वाले चंद्रा जी ने अपनी बुद्धिमानी, चालाकी, साहस, दूरदृष्टि, परिश्रम और संपर्कों के माध्यम से आगे बढ़ते हुए कई क्षेत्रों में हाथ आज़माया और कई कंपनियों के मालिक बन गए। किसी समय वे केवल १७ रूपये लेकर दिल्ली आए थे और आज उनका पूरा नेटवर्क और नेटवर्थ कितने हज़ार करोड़ का है, इसका ठीक-ठीक अनुमान लगाना मेरे लिए तो संभव नहीं है। उनकी कहानी भले ही बहुत आदर्शवादी नहीं है, लेकिन यथार्थवादी और व्यावहारिक है।

डॉ. सुभाष चंद्रा का जन्म हरियाणा में हिसार के पास एक छोटे-से कस्बे में हुआ था। वहीं उनका पारिवारिक व्यापार भी था। उनका बचपन वहीं बीता। उनके पिताजी व्यापार के कारण घर से दूर रहते थे, इसलिए दादाजी ने ही उनका पालन-पोषण किया। व्यापार में और जीवन में भी दादाजी के व्यक्तित्व और शिक्षाओं का उनके मन पर गहरा प्रभाव रहा। व्यापारी परिवार में जन्म लने के कारण स्वाभाविक रूप से ही वे छोटी उम्र से ही धीरे-धीरे व्यापार से जुड़ते गए और लेनदेन की बारीकियां सीखने लगे। लेकिन पढ़ाई में भी उनकी अच्छी रुचि थी और दसवीं की परीक्षा में अच्छे अंक मिलने के कारण आगे पढ़ने का उत्साह भी बढ़ा। उन्होंने इंजीनियरिंग डिप्लोमा में सिरसा के पंजाब पॉलिटेक्निक इंस्टीट्यूट में प्रवेश लिया। वास्तव में अब वे पहली बार घर से बाहर निकले थे। यहां अकेले रहने के दौरान कई नए अनुभवों से बहुत-कुछ सीखने को मिला, नए और अजनबी लोगों से बात करने के अवसर मिलते रहने के कारण दुनिया के बारे में और जीवन के अपने भावी लक्ष्यों के बारे में समझ विकसित हुई और अधिक स्पष्टता बढ़ी।

लेकिन दुर्भाग्य से कॉलेज के दूसरे वर्ष में उन्हें पढ़ाई छोड़कर घर वापस लौटना पड़ा। दादाजी को व्यापारी में भारी घाटा हुआ था, और परिवार पर बहुत कर्ज चढ़ गया था, जिसके कारण पढ़ाई का खर्च उठा पाना भी असंभव हो गया था। पढ़ाई छोड़कर वे घर लौट आए, कुछ महीने निराशा में बीते, लेकिन फिर उन्होंने आगे बढ़कर व्यापार को फिर संभालने का निश्चय किया और उस दिशा में प्रयास शुरू कर दिए। यह बहुत कठिन समय था क्योंकि परिवार की साख समाप्त हो चुकी थी, जेब में कोई पूंजी नहीं थी और यहां तक कि कोई उधार देने को भी तैयार नहीं होता था। कई प्रयासों और कई असफलताओं के बावजूद संघर्ष जारी रखा और धीरे-धीरे सफलता मिलने लगी। शुरुआत बहुत छोटे स्तर से हुई। उन्होंने किसी तरह प्रयास करके अपने परिवार की एक पुरानी बंद पड़ी मिल को फिर से शुरू करने और थोड़ा लाभ कमाने में सफलता पाई। इससे उनका उत्साह बढ़ा और उन पर लोगों का विश्वास भी बढ़ा। फिर अपने भाइयों के साथ मिलकर कुछ अन्य छोटे व्यापार भी शुरू किए। वह ऐसा दौर था, जब मजदूरी के दस रुपये बचाने के लिए इन भाइयों ने अनाज से भरे बोरे भी अपनी पीठ पर खुद उठाए और मुनीम की तनख्वाह बचाने के लिए हिसाब-किताब भी खुद ही संभाला। लेकिन इस मेहनत का फल भी मिला और दो वर्षों में ही उन्होंने बहुत-सा कर्ज भी चुका दिया।
अब उनका अनुभव और आत्मविश्वास दोनों बढ़ चुका था। अब वे अपने व्यापार का विस्तार करने के लिए कुछ नए प्रयास करना चाहते थे। लेकिन वे समझते थे कि हिसार जैसे छोटे शहर बहुत ज्यादा संभावनाएं नहीं हैं। उन्हें यदि कुछ बड़ा करना है, तो दिल्ली जाना पड़ेगा। इसी विचार से प्रेरित होकर २० वर्ष की आयु में उन्होंने हिसार छोड़ा और दिल्ली की राह पकड़ी। जब वे दिल्ली आए, उस समय उनकी जेब में केवल १७ रुपये थे। यहां से उनके जीवन का एक नया अध्याय शुरू होने जा रहा था। कुछ समय तक वे अपने एक परिचित व्यापारी के यहां काम करने लगे और रात में वहीं दुकान के बरामदे में सोया करते थे। आगे कुछ प्रयासों के बाद उन्हें भारतीय खाद्य निगम की ओर से अनाज की आपूर्ति का एक ठेका मिल गया, जिसके लिए उन्हें एक मिल भी किराए पर लेनी पड़ी। अब उनका नया ठिकाना यहीं बन गया। दिन-भर काम करते और रात में मिल में ही सोते थे। धीरे-धीरे दिल्ली में पांव जमने लगे और उन्होंने नए व्यवसायों में हाथ आज़माना शुरू किया। दूरसंचार निगम को टेलीफोन के खंभों की आपूर्ति करने के एक सौदे के लिए उन्होंने पहली बार किसी के साथ साझेदारी की, लेकिन उसमें धोखा खाया। आगे वे पैकेजिंग के व्यवसाय में भी उतरे और इसमें सफल रहे।

इन वर्षों तक दिल्ली में रहने के दौरान कई राजनेताओं और नौकरशाहों से उन्होंने अच्छा संपर्क बना लिया था और उनकी मदद से कारोबार भी बढ़ता रहा। १९८१ में राजीव गांधी की मदद से उन्हें यूएससआर को बासमती चावल निर्यात करने का ठेका मिला, और यह उनके लिए अब तक का सबसे बड़ा अवसर साबित हुआ। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। आगे उन्होंने मुंबई में भी अपना कारोबार बढ़ाया। उन्होंने टूथपेस्ट की पैकिंग की एक फैक्ट्री वहां स्थापित की। पैकिंग की यह तकनीक उस समय भारत में नई थी। आगे मुंबई के पास ही उनकी कंपनी ने मनोरंजन पार्क एस्सेल वर्ल्ड भी बनाया।

लेकिन वास्तव में जिस व्यवसाय के कारण डॉ. सुभाष चंद्रा की पहचान बनी है, वह ज़ी टीवी है। इसकी स्थापना एक अपमान के कारण हुई थी। वे एक विदेशी प्रसारण कंपनी के साथ साझेदारी करना चाहते थे, लेकिन प्रस्ताव ठुकरा दिए जाने से आहत होकर उन्होंने अपना ही चैनल शुरू करने का निर्णय लिया। लेकिन वास्तव में उस समय डॉ. चंद्रा यह तक नहीं जानते थे कि उपग्रह क्या होता है और चैनल के प्रसारण के लिए इसकी क्या आवश्यकता है। दूरदर्शन के ही कुछ अधिकारियों और इंजीनियरों की मदद से उन्हें इन बातों की जानकारी मिली और फिर हांगकांग की एक कंपनी से उपग्रह किराए पर लेने की योजना बनी। तब भारत में निजी चैनलों की अनुमति नहीं थी, इसलिए उन्होंने हांगकांग से ही इसे प्रसारित करने का निश्चय किया। भारत के स्थापित निर्माता-निर्देशक इस नए चैनल के साथ काम करने के लिए बहुत ज्यादा रकम की मांग कर रहे थे, इसलिए नए लोगों को मौक़ा दिया गया और उनसे कार्यक्रम बनवाए गए। रोज रात को हवाई जहाज से वीडियो कैसेट हांगकांग भेजे जाते थे और अगले दिन वहां से उनका प्रसारण होता था। धीरे-धीरे इन कार्यक्रमों की लोकप्रियता बढ़ती गई और एक घंटे से शुरू होकर आगे २४ घंटों का एक चैनल शुरू हुआ और आज तो दुनिया भर में ज़ी ग्रुप के ढेरों चैनल चल रहे हैं। स्मृति ईरानी, रजत शर्मा और राजीव शुक्ल जैसे कई लोगों ने शुरुआती दिनों में ज़ी में ही काम किया था। केबल प्रसारण के लिए शुरू में स्टार टीवी समूह के साथ भी उनकी साझेदारी थी, लेकिन आगे टकराव बढ़ने के कारण वह साझेदारी नहीं टिक सकी।

टीवी चैनलों के साथ-साथ ही डॉ.चंद्रा की कंपनी ने सिटी केबल व्यवसाय भी शुरू किया और आगे कई वर्षों बाद डिश टीवी भी आया। वे मोबाइल नेटवर्क के क्षेत्र में भी जाना चाहते थे और इसके लिए एक अमरीकी कंपनी को उपग्रह बनाने का काम भी सौंपा गया था, लेकिन वह योजना साकार नहीं हो पाई। इसी प्रकार क्रिकेट प्रसारण के अधिकार पाने और आईसीएल क्रिकेट लीग शुरू करने के प्रयास भी बहुत आगे नहीं बढ़ सके। हालांकि कई अन्य क्षेत्रों में उनके प्रयासों को खूब सफलता मिली और आज उनका उद्योग समूह कई हजार करोड़ का है।

हिसार में छोटी-सी शुरुआत से लेकर आज हजारों करोड़ के साम्राज्य तक पहुंचने की यह पूरी यात्रा बहुत रोचक, रोमांचक और शिक्षाप्रद है। हालांकि सफलता पाने के लिए उनके द्वारा अपनाए गए कुछ तरीकों से मैं सहमत नहीं हूं, लेकिन मुझे ये बहुत अच्छा लगा कि उन्होंने ईमानदारी से और स्पष्ट रूप से ऐसे प्रसंगों का भी उल्लेख किया है, जब उन्होंने कोई काम करने के लिए रिश्वत दी या ऐसा कोई और अनैतिक या गैर-कानूनी तरीका अपनाया। दूसरी अच्छी बात ये लगी कि उनके जो प्रयास विफल रहे या जिन परियोजनाओं में उन्होंने अपने गलत निर्णयों के कारण नुकसान उठाया, उनके बारे में भी उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा है और अपनी गलतियां स्वीकार भी की है। तीसरी एक अच्छी बात ये लगी कि कई कठिन प्रसंगों में जहां रिश्तेदारों, सहयोगियों, कर्मचारियों, राजनेताओं या अन्य कॉर्पोरेट प्रतिस्पर्धियों ने उनके साथ कोई धोखा किया या जिनसे किसी मामले को लेकर संघर्ष की स्थिति बनी, उनके बारे में भी उन्होंने खुलकर लिखा है और ऐसे लोगों के नाम भी स्पष्ट रूप से लिखे हैं। ऐसा साहस बहुत कम ही लोग दिखा पाते हैं। चौथी अच्छी बात ये है कि बहुत शुरूआती दौर में जब वे अपना पहला व्यवसाय स्थापित करने के लिए संघर्षरत थे, तब से आज तक जितने लोगों ने महत्वपूर्ण प्रसंगों में उनकी मदद की थी, उन सबका पुस्तक में कृतज्ञता से उल्लेख है। इतने बड़े व्यावसायिक साम्राज्य के शीर्ष पर होते हुए भी पुराने दिनों में मदद करने वालों को न भूलना और सार्वजनिक रूप से उनका उल्लेख करके कृतज्ञता व्यक्त करने वाकई आज के समय में दुर्लभ बात है क्योंकि आज-कल तो अधिकांश लोग अपना काम निकल जाने के बाद मदद करने वाले को पहचानते तक नहीं हैं।

पुस्तक के कई प्रसंगों में यह उदाहरण देखने को मिलते हैं कि व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता में आगे बढ़ने के लिए लोग कैसी चालें चलते हैं और व्यक्ति को हर कदम पर कितना सतर्क रहने की आवश्यकता होती है। जैसे प्रतिस्पर्धी कंपनियों ने अपने वफादार लोग उनकी टीम में भेजने में सफलता पा ली थी, जिन्होंने कंपनी की गुप्त जानकारी प्रतिस्पर्धियों तक पहुंचा दी और इन्हें घाटा उठाना पड़ा। दूसरी ओर ऐसे प्रसंग भी हैं, जब इन्होंने भी नैतिक-अनैतिक तरीकों से अपने लाभ के लिए आवश्यक जानकारी जुटाने में सफलता पाई। धोखा देने वाले साझेदारों के उदाहरण हैं, तो हर प्रसंग में साथ निभाने वाले मित्रों और कर्मचारियों के उदाहरण भी पुस्तक में हैं। साथ ही कई प्रधानमंत्रियों, केबिनेट मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, नौकरशाहों आदि के साथ भी सांठ-गांठ और कटुता दोनों ही तरह के कई प्रसंगों का भी विस्तृत विवरण है। ये बहुत अच्छा है कि उन्होंने खुलकर सबके नाम लिखे हैं। कुछ बातें कई लोगों को हैरान कर सकती हैं, जैसे यह दावा कि जब रूपर्ट मर्डोक न्यूज़कॉर्प का अपना हिस्सा डॉ.चंद्रा को बेचने वाले थे, तो इस बात की जानकारी से अटलजी की सरकार नाराज़ हुई और जब सुषमा स्वराज संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाग लेने के लिए न्यूयॉर्क गईं थीं, तब उन्होंने स्वयं मर्डोक से मिलकर उन्हें ज़ी टीवी के साथ सौदा न करने के लिए मनाया। व्यापार और कारोबार के अलावा डॉ. चंद्रा ने विपश्यना और एकल विद्यालय जैसे कुछ सामाजिक कार्यों के लिए भी योगदान किया है, उनका भी विस्तृत विवरण अंतिम अध्यायों में है।

मुझे यह पुस्तक अच्छी लगी और इसे पढ़कर मुझे जीवन के बारे में और कारोबार जगत के बारे में बहुत-कुछ सीखने को भी मिला। यह मूलतः अंग्रेज़ी में लिखी गई थी, जिसका मैंने हिन्दी अनुवाद पढ़ा। पुस्तक की विषय-वस्तु बहुत अच्छी है, लेकिन वास्तव में इसका यह अनुवाद मुझे बहुत रूखा और ऊबाऊ लगा। उसमें बहुत सुधार की गुंजाइश है। अनुवाद की कमियों के अलावा कुल मिलाकर पुस्तक अच्छी है।

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